# कैसे ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवाद के सामने आत्मसमर्पण किया

1949 में इज़राइल को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित करना और संयुक्त
राष्ट्र में उसका सदस्यता प्राप्त करना 20वीं सदी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण
मोड़ था, जो कूटनीति, भू-राजनीति और हिंसा के अस्थिर मिश्रण से प्रेरित था। इस
प्रक्रिया के केंद्र में ज़ायोनी चरमपंथी समूहों, विशेष रूप से इर्गुन और लेही के
कार्य थे, जिनके अत्यधिक हिंसक कृत्य---जिन्हें आधुनिक मानकों के अनुसार अब
आतंकवाद के रूप में वर्गीकृत किया जाता है---ने ब्रिटेन पर पालेस्टाइन मंडेट को
छोड़ने के लिए दबाव बनाने और संयुक्त राष्ट्र को इज़राइल को मान्यता देने के लिए
मजबूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह लेख तर्क देता है कि ब्रिटेन और
संयुक्त राष्ट्र, इन हिंसक अभियानों से अभिभूत होकर, प्रभावी रूप से ज़ायोनी
आतंकवाद के सामने झुक गए, और इज़राइल की राज्यता को स्वीकार कर लिया, भले ही उसने
संयुक्त राष्ट्र की शर्तों, जिसमें विभाजन योजना, शरणार्थी अधिकार और मानवाधिकार
दायित्व शामिल थे, का केवल आंशिक रूप से पालन किया। यह लेख ब्रिटिश मंडेट के
पालेस्टाइनी अधिकारों की रक्षा करने की प्रतिबद्धता, ब्रिटिश शासन को समाप्त करने
के लिए ज़ायोनी समूहों की रणनीतियों, इज़राइल की संयुक्त राष्ट्र मान्यता की
शर्तों, और इज़राइल की क्षेत्रीय विस्तार के साथ होने वाले गैर-अनुपालन और
मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच करता है।

## ब्रिटिश मंडेट और पालेस्टाइनी लोगों के प्रति इसकी जिम्मेदारियां

1922 में राष्ट्रसंघ द्वारा औपचारिक रूप से स्थापित ब्रिटिश मंडेट फॉर पालेस्टाइन
एक कानूनी ढांचा था, जिसे पूर्व ओटोमन क्षेत्र का प्रशासन करने और इसे स्व-शासन
के लिए तैयार करने का कार्य सौंपा गया था। इसमें 1917 की बॉलफोर घोषणा शामिल थी,
जिसमें ब्रिटेन ने "पालेस्टाइन में यहूदी लोगों के लिए एक राष्ट्रीय घर की
स्थापना" को सुगम बनाने की प्रतिबद्धता जताई थी, साथ ही यह सुनिश्चित किया गया था
कि "ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जो मौजूदा गैर-यहूदी समुदायों के नागरिक और
धार्मिक अधिकारों को नुकसान पहुंचाए।" 1920 के दशक की शुरुआत में पालेस्टाइन की
आबादी लगभग 90% अरब (मुस्लिम और ईसाई) और 10% यहूदी थी, इसलिए पालेस्टाइनी
अधिकारों की रक्षा एक मुख्य दायित्व था।

मंडेट के पालेस्टाइनी लोगों के लिए प्रमुख प्रावधानों में उनके नागरिक और धार्मिक
अधिकारों की सुरक्षा, यह सुनिश्चित करना कि यहूदी आप्रवास उनकी स्थिति को नुकसान
न पहुंचाए, उनकी धार्मिक संस्थाओं का सम्मान सुनिश्चित करना, और बिना भेदभाव के
अंतरात्मा की स्वतंत्रता, पूजा और शिक्षा की गारंटी देना शामिल था। ब्रिटेन को
जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रसंघ को每年報告 करना आवश्यक था। हालांकि,
मंडेट के दोहरे उद्देश्य---यहूदी राष्ट्रीय घर का समर्थन करना और साथ ही
पालेस्टाइनी अधिकारों की रक्षा करना---असंगत साबित हुए। यहूदी आप्रवास 1917 में
60,000 से बढ़कर 1947 तक 600,000 हो गया, और भूमि खरीद ने अरबों में विस्थापन की
आशंका को बढ़ाया। ब्रिटेन के साझा शासन बनाने के प्रयास, जैसे कि एक विधायी
परिषद, अरबों के बहिष्कार और यहूदियों की अल्पसंख्यक स्थिति की चिंताओं के कारण
विफल हो गए, जिससे तनाव बढ़ गया।

## ज़ायोनी चरमपंथी हिंसा: आतंकवाद की एक मुहिम

ज़ायोनी संगठन, जो एक यहूदी राज्य के लक्ष्य से प्रेरित थे, 1940 के दशक में
विशेष रूप से 1939 के श्वेत पत्र के बाद, जिसमें पांच वर्षों में यहूदी आप्रवास
को 75,000 तक सीमित किया गया और एक एकीकृत पालेस्टाइनी राज्य की परिकल्पना की गई
थी, उग्रवादी बन गए। मेनकेम बेगिन के नेतृत्व में इर्गुन और स्टर्न गैंग के नाम
से जाना जाने वाला लेही ने ब्रिटिश शासन को असंभव बनाने के लिए अत्यधिक हिंसा
अपनाई, जिसमें सैन्य, नागरिक और कूटनीतिक लक्ष्यों पर हमले किए गए, जो आधुनिक
आतंकवाद की परिभाषाओं को पूरा करते हैं। उनका लक्ष्य एक "ग्रेटर इज़राइल" था,
जिसमें पूरे मंडेट पालेस्टाइन, जिसमें वेस्ट बैंक और ट्रांसजॉर्डन शामिल थे,
शामिल था, और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के विभाजन योजना जैसे समझौतों को खारिज कर
दिया।

### प्रमुख हिंसक कृत्य

1.  **सैन्य लक्ष्य:**
    -   फरवरी 1946 में, इर्गुन और लेही ने ब्रिटिश हवाई अड्डों पर 15 विमानों को
        नष्ट कर दिया और आठ को क्षतिग्रस्त किया, जिससे सैन्य नियंत्रण कमजोर
        हुआ।
    -   जुलाई 1947 में, इर्गुन ने निष्पादित सदस्यों के बदले में ब्रिटिश
        सर्जेंट्स क्लिफर्ड मार्टिन और मर्विन पैस को अपहरण कर लिया और फांसी दी,
        जिसने ब्रिटिश जनमत को स्तब्ध कर दिया और संघर्ष की क्रूरता को उजागर
        किया।
2.  **नागरिक बुनियादी ढांचा:**
    -   जून 1946 में, हगनाह, इर्गुन और लेही ने पालेस्टाइन को पड़ोसी देशों से
        जोड़ने वाले ग्यारह में से नौ पुलों को नष्ट कर दिया, जिससे क्षेत्र
        अलग-थलग हो गया और ब्रिटिश रसद व्यवस्था बाधित हुई।
    -   जुलाई 1946 में, इर्गुन ने यरूशलेम में किंग डेविड होटल, जो ब्रिटिश
        प्रशासनिक मुख्यालय था, को बम से उड़ा दिया, जिसमें 91 लोग मारे गए (41
        अरब, 28 ब्रिटिश, 17 यहूदी), जिसने शासन को गंभीर रूप से कमजोर किया।
3.  **नागरिकों पर हमले:**
    -   इर्गुन ने हाइफा और यरूशलेम में अरब बाजारों पर बमबारी की, जिसमें
        दर्जनों लोग मारे गए और सामुदायिक तनाव बढ़ा, जिससे व्यापक भय फैल गया।
    -   अप्रैल 1948 में, इर्गुन और लेही ने देयर यासीन में 100 से अधिक
        पालेस्टाइनी ग्रामीणों, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल थे, की नरसंहार
        किया, जिसने पालेस्टाइनी लोगों के सामूहिक पलायन को शुरू किया और
        शरणार्थी संकट को तेज किया।
4.  **विदेशों में ब्रिटिश परिसरों पर हमले:**
    -   अक्टूबर 1946 में, इर्गुन ने रोम में ब्रिटिश दूतावास पर 40 किलो टीएनटी
        से बमबारी की, जिसमें दो लोग घायल हुए और इमारत को नुकसान पहुंचा, जिसमें
        बेगिन के सहयोगी ज़ीव एप्सटीन शामिल थे।
    -   अगस्त 1947 में, इर्गुन ने वियना के होटल सैशर में ब्रिटिश मुख्यालय पर
        सूटकेस बम विस्फोट किए, जिससे हल्का नुकसान हुआ लेकिन प्रचार प्रभाव
        बढ़ा।
5.  **उच्च-स्तरीय अधिकारियों की हत्याएं:**
    -   नवंबर 1944 में, लेही ने मध्य पूर्व के लिए ब्रिटिश मंत्री लॉर्ड मोयने
        की काहिरा में हत्या कर दी, जो ब्रिटिश प्राधिकार के प्रति अवज्ञा का
        संकेत था।
    -   सितंबर 1948 में, लेही ने यरूशलेम में संयुक्त राष्ट्र मध्यस्थ फोल्के
        बर्नाडोट की हत्या कर दी, जो उनके संशोधित विभाजन योजना का विरोध कर रहे
        थे, जिसमें यहूदी क्षेत्र को कम किया गया था और शरणार्थियों की वापसी पर
        जोर दिया गया था।

### अतिरिक्त रणनीतियाँ

-   **अवैध आप्रवास (अलियाह बेट):** यहूदी एजेंसी ने, इर्गुन और लेही के समर्थन
    से, अवैध आप्रवास का आयोजन किया, जिसमें दसियों हज़ार यहूदी शरणार्थियों को
    पालेस्टाइन लाया गया। जुलाई 1947 में एसएस एक्सोडस घटना, जहां ब्रिटेन ने
    4,515 शरणार्थियों को जबरन यूरोप वापस भेजा, एक प्रचार जीत बन गई, जिसने
    ब्रिटेन की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया।
-   **प्रचार अभियान:** ज़ायोनी समूहों ने ब्रिटिश नीतियों को यहूदी-विरोधी के
    रूप में चित्रित किया, विशेष रूप से अमेरिका में होलोकॉस्ट के प्रति
    सहानुभूति का लाभ उठाकर, एंग्लो-अमेरिकी संबंधों पर दबाव डाला।
-   **वित्तीय समर्थन:** यूनाइटेड ज्यूइश अपील ने 1947 में 150 मिलियन डॉलर
    जुटाए, जिनमें से आधा पालेस्टाइन के लिए था, जो प्रतिरोध प्रयासों को वित्त
    पोषित करता था।

इन कार्यों ने एक अनियंत्रित वातावरण बनाया, जिसमें अनुमानित आर्थिक नुकसान 2
मिलियन पाउंड और सैकड़ों ब्रिटिश हताहतों के साथ था, जिसने युद्ध से थके हुए
ब्रिटेन को अभिभूत कर दिया।

## ब्रिटिश आत्मसमर्पण: आतंकवाद के सामने झुकना

ब्रिटेन का मंडेट छोड़ने का निर्णय, जो फरवरी 1947 में घोषित किया गया और 14 मई
1948 को पूरा हुआ, ज़ायोनी हिंसा के निरंतर दबाव और व्यापक बाधाओं से प्रेरित था।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, ब्रिटेन 3 बिलियन पाउंड के कर्ज से जूझ रहा था और
अमेरिकी ऋणों पर निर्भर था। पालेस्टाइन में 100,000 सैनिकों को बनाए रखना, जो
प्रति वर्ष लाखों की लागत लेता था, घरेलू पुनर्निर्माण की मांगों के बीच अस्थिर
था। ब्रिटिश जनमत, युद्ध और हताहतों से थक चुका, मंडेट के खिलाफ हो गया, और
मीडिया ने पालेस्टाइन को एक दलदल के रूप में चित्रित किया। 100,000 यहूदी
शरणार्थियों को स्वीकार करने के लिए अमेरिकी दबाव और विभाजन के लिए सोवियत समर्थन
ने ब्रिटेन की स्थिति को और कमजोर किया।

इर्गुन और लेही की हिंसा, विशेष रूप से किंग डेविड होटल बम विस्फोट और सर्जेंट्स
अफेयर जैसे हाई-प्रोफाइल घटनाओं ने ब्रिटिश सेनाओं को हतोत्साहित किया और
राजनीतिक इच्छाशक्ति को कमजोर किया। इन आतंकवादी कृत्यों ने, जो अराजकता और भय
पैदा करते थे, ब्रिटेन की शासन करने की अक्षमता में सीधे योगदान दिया। इस मुद्दे
को संयुक्त राष्ट्र को सौंपकर, ब्रिटेन ने स्वीकार किया कि वह हिंसा को प्रबंधित
नहीं कर सकता या मंडेट के परस्पर विरोधी दायित्वों को समेट नहीं सकता, प्रभावी
रूप से ज़ायोनी चरमपंथ के सामने झुक गया, जबकि पालेस्टाइनी अधिकारों की रक्षा
करने की अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में विफल रहा।

## संयुक्त राष्ट्र की मान्यता और सदस्यता: शर्तें और आत्मसमर्पण

संयुक्त राष्ट्र, राष्ट्रसंघ के उत्तराधिकारी के रूप में, ने 1947 में पालेस्टाइन
प्रश्न को विरासत में लिया। इसकी प्रतिक्रिया ने इज़राइल की राज्यता और सदस्यता
को आकार दिया, लेकिन यह प्रक्रिया ज़ायोनी समूहों द्वारा बनाए गए हिंसक संदर्भ से
बहुत प्रभावित थी।

### संयुक्त राष्ट्र का विभाजन योजना और इज़राइल की राज्यता

नवंबर 1947 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 181 पारित किया, जिसमें
पालेस्टाइन को यहूदी (56%) और अरब (43%) राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव
था, जिसमें यरूशलेम को अंतरराष्ट्रीय बनाया गया था। यहूदी एजेंसी ने इस योजना को
स्वीकार कर लिया, इसे राज्यता की ओर एक मार्ग के रूप में देखते हुए, जबकि अरब
नेताओं ने इसे खारिज कर दिया, किसी भी यहूदी राज्य का विरोध करते हुए। 14 मई 1948
को, जब मंडेट समाप्त हुआ, इज़राइल ने स्वतंत्रता की घोषणा की, जिसमें प्रस्ताव
181 का हवाला दिया गया। इसके बाद की अरब-इज़राइल युद्ध ने 1949 के युद्धविराम
समझौतों द्वारा इज़राइल के क्षेत्र को मंडेट पालेस्टाइन के 78% तक विस्तारित कर
दिया, जो संयुक्त राष्ट्र के आवंटन से अधिक था।

### संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए शर्तें

इज़राइल ने 11 मई 1949 को प्रस्ताव 273 (III) के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र की
सदस्यता प्राप्त की, जिसमें 37 मत पक्ष में, 12 विरोध में (ज्यादातर अरब राज्य)
और 9 अनुपस्थित रहे। प्रवेश निम्नलिखित पर निर्भर था:

-   **संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन:** इज़राइल ने चार्टर के सिद्धांतों को
    बनाए रखने का वचन दिया, जिसमें विवादों का शांतिपूर्ण समाधान और मानवाधिकारों
    का सम्मान शामिल था।
-   **प्रस्ताव 181 (विभाजन योजना):** इज़राइल की घोषणा और संयुक्त राष्ट्र के
    बयानों ने विभाजन योजना की स्वीकृति की पुष्टि की, हालांकि इसके विस्तारित
    सीमाओं को युद्ध की वास्तविकता के रूप में मौन रूप से स्वीकार किया गया।
-   **प्रस्ताव 194 (शरणार्थी अधिकार):** अनुच्छेद 11 ने पालेस्टाइनी शरणार्थियों
    की वापसी या मुआवजे की मांग की। इज़राइल ने बातचीत के लिए इच्छा व्यक्त की
    लेकिन सुरक्षा और जनसांख्यिकीय चिंताओं का हवाला देते हुए बड़े पैमाने पर
    वापसी का विरोध किया।
-   **मानवाधिकार दायित्व:** इज़राइल से उभरते मानवाधिकार मानदंडों का पालन करने
    की अपेक्षा की गई थी, जिसमें गैर-भेदभाव और अल्पसंख्यक अधिकार शामिल थे।

संयुक्त राष्ट्र का निर्णय निम्नलिखित से प्रभावित था:

-   **ज़ायोनी हिंसा:** 1948 में लेही द्वारा संयुक्त राष्ट्र मध्यस्थ फोल्के
    बर्नाडोट की हत्या, जो उनके संशोधित विभाजन योजना का विरोध कर रही थी, ने
    कट्टरपंथियों के समझौता अस्वीकार करने को रेखांकित किया। हालांकि इज़राइल
    सरकार ने इस कृत्य की निंदा की, यह अस्थिर संदर्भ को उजागर करता था।
-   **भू-राजनीतिक समर्थन:** अमेरिका और सोवियत संघ ने एक-दूसरे के प्रभाव को
    काटने और होलोकॉस्ट के बाद मानवीय चिंताओं को संबोधित करने के लिए इज़राइल की
    स्वीकृति का समर्थन किया।
-   **व्यावहारिकता:** संयुक्त राष्ट्र ने इज़राइल की विस्तारित क्षेत्र पर
    वास्तविक नियंत्रण को मान्यता दी, स्थिरता को प्रस्ताव 181 की सीमाओं के सख्त
    प्रवर्तन से अधिक प्राथमिकता दी।

इज़राइल को स्वीकार करके, संयुक्त राष्ट्र ने ज़ायोनी आतंकवाद द्वारा बनाई गई
वास्तविकता के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, जिसने ब्रिटेन की वापसी को मजबूर किया
और सैन्य लाभों के माध्यम से एक तथ्यपूर्ण स्थिति बनाई। शर्तें, हालांकि इज़राइल
द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकार की गई थीं, ढीली तरह से लागू की गई थीं, जिससे
इज़राइल को पूर्ण अनुपालन से बचने की अनुमति मिली।

## इज़राइल का गैर-अनुपालन और मानवाधिकार उल्लंघन

इज़राइल की संयुक्त राष्ट्र सदस्यता संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और
मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धताओं पर आधारित थी, लेकिन इसके कार्यों ने
महत्वपूर्ण गैर-अनुपालन दिखाया, जिसके साथ क्षेत्रीय विस्तार और मानवाधिकार
उल्लंघन भी आए।

### संयुक्त राष्ट्र की शर्तों का गैर-अनुपालन

1.  **प्रस्ताव 181 (विभाजन योजना):**
    -   1949 में इज़राइल की सीमाएँ मंडेट पालेस्टाइन के 78% को कवर करती थीं, जो
        प्रस्ताव 181 द्वारा आवंटित 56% से कहीं अधिक थी। पश्चिमी गलील और नेवेग
        के कुछ हिस्सों जैसे क्षेत्रों को विजय के माध्यम से शामिल किया गया,
        बिना अरब राज्य की स्थापना के।
    -   विभाजन योजना को पूरी तरह से लागू करने में यह विफलता अरबों की शिकायतों
        को बढ़ावा देती थी और संयुक्त राष्ट्र के ढांचे को कमजोर करती थी।
2.  **प्रस्ताव 194 (शरणार्थी अधिकार):**
    -   इज़राइल ने 1948 में विस्थापित हुए लगभग 700,000 पालेस्टाइनी शरणार्थियों
        की वापसी को रोक दिया, भले ही प्रस्ताव 194 में प्रत्यावर्तन या मुआवजे
        की मांग की गई थी। 1950 का अनुपस्थित संपत्ति कानून शरणार्थियों की भूमि
        को यहूदी स्वामित्व में स्थानांतरित कर देता था, जनसांख्यिकीय नियंत्रण
        को प्राथमिकता देता था।
    -   शरणार्थी संकट अरब-इज़राइल संघर्ष का एक आधार बन गया, जिसमें लाखों लोग
        जॉर्डन, लेबनान और सीरिया में शिविरों में बिना नागरिकता के रहे।
3.  **संयुक्त राष्ट्र चार्टर और मानवाधिकार:**
    -   इज़राइल की अपनी अरब अल्पसंख्यक पर सैन्य शासन (1948-1966) ने नागरिक
        स्वतंत्रताओं को प्रतिबंधित किया, जिसमें आंदोलन और राजनीतिक अभिव्यक्ति
        शामिल थी, जिसने गैर-भेदभाव के सिद्धांतों का उल्लंघन किया। भेदभावपूर्ण
        भूमि कानून और असमान संसाधन आवंटन ने पालेस्टाइनी नागरिकों को हाशिए पर
        धकेल दिया।
    -   इन प्रथाओं ने प्रणालीगत असमानताओं को मजबूत किया, जो संयुक्त राष्ट्र
        चार्टर की मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के विपरीत थीं।

### क्षेत्रीय विस्तार

इज़राइल की महत्वाकांक्षाएँ 1949 की युद्धविराम रेखाओं से परे थीं:

-   1956 में, इज़राइल ने सुएज़ संकट के दौरान सिनाई प्रायद्वीप पर कब्जा कर
    लिया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के दबाव में वापस हट गया, जो विस्तारवादी
    प्रवृत्तियों का संकेत देता था।
-   1967 की छह-दिवसीय युद्ध में, इज़राइल ने वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी, पूर्वी
    यरूशलेम और गोलन हाइट्स पर कब्जा कर लिया, मंडेट पालेस्टाइन के शेष 22% पर
    कब्जा कर लिया। पूर्वी यरूशलेम की अनुलग्नक और बस्तियों का विस्तार
    अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करता था, जिसमें चौथे जेनेवा कन्वेंशन का
    निषेध शामिल था, जो कब्जे वाले क्षेत्र में बस्तियों के स्थानांतरण पर रोक
    लगाता था।
-   2025 तक, 700,000 से अधिक इज़राइली बस्तीवासी वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलेम
    में रहते हैं, जो राज्य नीतियों द्वारा समर्थित हैं, जो कब्जे को मजबूत करते
    हैं और पालेस्टाइनी लोगों को विस्थापित करते हैं।

### मानवाधिकार उल्लंघन

कब्जे वाले क्षेत्रों में इज़राइल के कार्य दस्तावेजी मानवाधिकार उल्लंघनों का
गठन करते हैं:

-   **विस्थापन और घरों का विध्वंस:** बस्ती विस्तार या दंडात्मक कारणों से
    हजारों पालेस्टाइनी घरों को ध्वस्त किया गया है, जो आवास और संपत्ति के
    अधिकारों का उल्लंघन करता है।
-   **आंदोलन प्रतिबंध:** चेकपॉइंट्स, वेस्ट बैंक बैरियर और गाजा नाकाबंदी
    पालेस्टाइनी गतिशीलता को सीमित करते हैं, जिससे काम, स्वास्थ्य सेवा और
    शिक्षा तक पहुंच प्रभावित होती है, जो आंदोलन की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता
    है।
-   **अत्यधिक बल और हिरासत:** सैन्य अभियान और प्रशासनिक हिरासत, अक्सर बिना
    मुकदमे के, ने नागरिकों की मौत और मनमानी कारावास को जन्म दिया है, जो उचित
    प्रक्रिया और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है।
-   **प्रणालीगत भेदभाव:** रिपोर्ट्स इज़राइल की नीतियों को apartheid के रूप में
    वर्णित करते हैं, जिसमें अलगाव, असमान अधिकार और इज़राइल और कब्जे वाले
    क्षेत्रों में पालेस्टाइनी लोगों के खिलाफ प्रणालीगत भेदभाव का उल्लेख किया
    गया है।

ये उल्लंघन, जो इज़राइल की क्षेत्रीय नियंत्रण और यहूदी जनसांख्यिकीय प्रभुत्व की
प्राथमिकता से प्रेरित हैं, संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता की शर्तों, विशेष रूप से
मानवाधिकार और शरणार्थी दायित्वों के साथ तीव्र विरोधाभास में हैं।

## निष्कर्ष

इर्गुन और लेही जैसे ज़ायोनी चरमपंथी समूहों ने आतंकवादी कृत्यों के माध्यम
से---जो सैन्य हवाई अड्डों, नागरिक बुनियादी ढांचे, अरब आबादी, विदेशों में
ब्रिटिश परिसरों और मोयने और बर्नाडोट जैसे अधिकारियों की हत्या पर लक्षित
थे---ब्रिटेन को पालेस्टाइन मंडेट को छोड़ने के लिए मजबूर किया। इन कार्यों ने,
युद्ध के बाद ब्रिटेन की कमजोरियों का फायदा उठाकर, शासन को असंभव बना दिया,
जिससे संयुक्त राष्ट्र की भागीदारी हुई। संयुक्त राष्ट्र ने 1947 में विभाजन
योजना प्रस्तावित की और 1949 में इज़राइल को सदस्य के रूप में स्वीकार किया,
संयुक्त राष्ट्र चार्टर, मानवाधिकार, प्रस्ताव 181 और शरणार्थी अधिकारों के पालन
की शर्त पर। इज़राइल की राज्यता को स्वीकार करके, इसके विस्तारित सीमाओं और सीमित
अनुपालन के बावजूद, ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र ने ज़ायोनी आतंकवाद द्वारा बनाई
गई वास्तविकता के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इज़राइल का बाद में
गैर-अनुपालन---विभाजन योजना से परे क्षेत्रों को बनाए रखना, शरणार्थियों की वापसी
को रोकना, और कब्जे और बस्तियों के माध्यम से मानवाधिकार उल्लंघनों को करना---ने
इसके संयुक्त राष्ट्र के प्रति दायित्वों को कमजोर किया, जिससे पालेस्टाइन संघर्ष
लंबा हुआ और पालेस्टाइनी अधिकार अपूर्ण रहे।
